Friday, December 18, 2009

बंद खिड़की


नुक्कड़ के लेम्प पोस्ट पे फिसलना चाहती हूँ,

गली के बच्चो के साथ खेलना चाहती हूँ,

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


होर्न बजाती गाड़ियों की आवाज़ सदा गिनती रही

ठेले वालों के राज़ गौर से सुनती रही,

अब खुद से हवा के तार छेड़ना चाहती हूँ

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


बच्चों की गेंदों की थाप सही,

न कुछ बोली मैं चुप चाप रही,

अब खुल के उन्हें डांटना चाहती हूँ

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


अपनी जिद्द को किया पूरा मैंने,

बाहर की हर बईमानी को घूरा मैंने,

जब देखा मासूमियत पे अत्याचार,

तो आँखें रोई हज़ार बार,

निर्दोषों का परिवार कहीं कोई लूट गया,

फिर किसी से अपना कोई छूट गया,


इन्हें देखकर आँखें बंद करना चाहती हूँ,

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो अब नहीं खुलना चाहती हूँ!!!

Wednesday, December 2, 2009

जाग रहा हूँ



वक्त से आगे निकलने के लिए

कितना भाग रहा हूँ?

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



मेहनत की एक हांड़ी में,

किताबी पुलाओ पकाए थे,

पूरे साल बचा बचा कर,

थोड़े थोड़े खाए थे!!

किस्मत ने एक शर्ट सिली थी

लम्हों से जो पेंट मिली थी,

उन्हें अब त्याग रहा हूँ,

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



चार आने की कोशिश को,

जेब में रखकर निकले थे,

मक्कारी के भारी केले,

पैरों तले कुचले थे,

सौ तोले के ख्वाब सजाकर लॉकर में

उनकी कुंजी खो दी, ठोकर में,

मैं जब भी बैराग रहा हूँ

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



अब तन्हाई के छल्ले हवा,

में लटक रहे हैं,

धीरे धीरे, लम्हों की

सिगरेट गटक रहे हैं,

पैसों में भीगा समय आज बदल गया

और धुंए में उलझा खर्चा भी तो चल गया,

मैं उँगलियों पे सूखा दाग रहा हूँ,

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!