नुक्कड़ के लेम्प पोस्ट पे फिसलना चाहती हूँ,
गली के बच्चो के साथ खेलना चाहती हूँ,
मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,
जो खुलना चाहती हूँ
होर्न बजाती गाड़ियों की आवाज़ सदा गिनती रही
ठेले वालों के राज़ गौर से सुनती रही,
अब खुद से हवा के तार छेड़ना चाहती हूँ
मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,
जो खुलना चाहती हूँ
बच्चों की गेंदों की थाप सही,
न कुछ बोली मैं चुप चाप रही,
अब खुल के उन्हें डांटना चाहती हूँ
मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,
जो खुलना चाहती हूँ
अपनी जिद्द को किया पूरा मैंने,
बाहर की हर बईमानी को घूरा मैंने,
जब देखा मासूमियत पे अत्याचार,
निर्दोषों का परिवार कहीं कोई लूट गया,
फिर किसी से अपना कोई छूट गया,
इन्हें देखकर आँखें बंद करना चाहती हूँ,
मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,
जो अब नहीं खुलना चाहती हूँ!!!
