Friday, October 22, 2010

जाना माना


एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है,
तस्वीरों में ही मिलती है, वो चाँद के जैसे खिलती है,
बातों में उसकी उलझन है, न कह दे उसका ही मन है,
हर वक़्त उसी का बहाना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!



गुस्से
में तीखी तीखी है, पर शहद से ज्यादा मीठी है,
अपने कन्धों पर भार लिए, उठती है सुबह तैयार किए,
कामयाबी को सर पे उठाना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!




उम्मीद
किरण का थामे हाथ, चलती है हवा के साथ साथ,
ख्वाहिश को रोज़ बदलती है, और शाम के जैसे ढलती है,
ठोकर में उसके ज़माना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!

एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है,
तस्वीरों में ही मिलती है, वो चाँद के जैसे खिलती है,
बातों में उसकी उलझन है, न कह दे उसका ही मन है,
हर वक़्त उसी का बहाना है!!

Monday, October 11, 2010

अजीब मोड़

कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

चलते हुए कदम में कहीं मोच आ गयी,
रुक कर के सब्र कर लो, यही सोच आ गयी,
गहरे अँधेरे रास्तों पर थम सा गया था वक़्त,
आसान नहीं था चलना, राहें थी सर्द सख्त,
कोशिश की पोटली को काँधें पे ढो लिया,

और भर लिया ख्वाबों को आँखों में रात भर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

ये रास्ता था अपना जाना सा पहचाना,
इस रात की छलनी से अच्छे से हमने छाना,
कुछ देर यूँ ही बैठे हम खाली खाली,
कुछ देर नींद लेके, आँखें की हमने काली,
खामोश सी हवा भी उड़ती सी जा रही थी,
हम थे किनारे बैठे अपनी ही राह पर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

Thursday, June 17, 2010

हवा


न है जज़्बात, न ही होश, बड़ी ही अजीब हवा,
दिखाई देती है एक सी ये बदतमीज़ हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
में होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा,
किसी मिजाज़ से ताल्लुक था मेरा सदियों से,
मेरे संग-संग उसके भी घर गयी ये हवा!!


इधर
-उधर की झंझटों से बेख़ौफ़ था,
मेरे होशोहवास का भी अजीब शौक था,
मुझे बहा के ले गयी किसी किनारे पे, मगर
मेरे अंदाज़-ऐ-रूबरू से डर गयी ये हवा!!

ये राह खूब थी, उड़ती थी मिटटी पैरों में,
सफ़र की भीड़ में गिनते थे खुद को गैरों में,
थाम के हाथ, बड़ी दूर तलक साथ चली,
जो आया मोड़ तो खुद-ब-खुद उतर गयी ये हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
मैं होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा!!


Monday, June 7, 2010

सिगरेट


लबों पर मोम सी पिघलती हुई,
धुंए के राज़ उगलती हुई,
ख़ामोशी से गल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!

एक से दो, तो दो से चार, बारी बारी सब तैयार,
थाम के सबकी ऊँगली जलती, थोडा थोडा सब से प्यार,
आपस की रंजिश को धीरे धीरे निगल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!




फिर
एक जली, माचिस की तीली,
चिंगारी से उम्मीद खिली,
ये अंगड़ाई उठाती हाथों की सुराही,
ले जाती है जाने किस गली?
जहाँ आवाजें बदल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥

न जागी है न सोई हुई,
बुझती है तो जैसे रोई हुई,
एक दूजे से नाराज है ये,
चुपचाप है कैसे खोई हुई,
हर पैकेट में डल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥




Wednesday, March 10, 2010

यहाँ


बस कुछ पल के अफ़साने हैं,
उस रोज़ नए चेहरे थे यहाँ,
जीने की एक उम्मीद बंधी थी,
जिस पल को तुम ठहरे थे यहाँ।

खामोश थे लब, अन्जान थे सब,
हैरत में पड़ी थी रातें,
एक सुर्ख नज़र थी फैली हुई,
कई राज़ इनमे गहरे थे यहाँ।
जीने की उम्मीद बंधी थी,
जिस पल को तुम ठहरे थे यहाँ!





मशहूर
थी रात, खामोश थी बात,
सहमी सी पड़ी थी यादें,
गुन्ज़ायिश थी बस सपनो की,
जब लम्हे सुनहरे थे यहाँ,
जीने की उम्मीद बंधी थी,
जिस पल को तुम ठहरे थे यहाँ!

साजिश की लहर थी चरों पहर,
कैदी थे पुराने ज़ख्म यहाँ
ख्वाहिश के परिंदे उड़ न पाए,
हर मोड़ पे कई पहरे थे यहाँ,
जीने की एक उम्मीद बंधी थी,
जिस पल को तुम ठहरे थे यहाँ। ।

part-2
होश के संग नया जोश भी है,
अब रंगों में उडी है खुशबू,
कोशिश की फ़िराक में भीगी हुई,
अजनबी सी लहरें हैं यहाँ,
तब कुछ पल के अफ़साने थे,
अब रोज़ नए चेहरें हैं यहाँ,
फिर से नयी एक राह सजेगी,
जिसके लिए हम ठहरे हैं यहाँ। ।

Tuesday, March 9, 2010

कोशिश

जब जीना आसान नहीं था, तब जीने की कोशिश की,
ख़्वाबों को सिरहाने रखकर, सो जाने की कोशिश की,
पहले वक़्त की चाबुक से इस दर्द को इतना पीटा,
फिर उलझे अश्कों को हमने सुलझाने की कोशिश की,

नीम के पत्ती जैसे, अलफ़ाज़ किसी के तीखे थे,
कड़वे घूँट को पीते पीते एक दम से ही चीखे थे,
नींद में उठकर इस दुनिया में फैले झूट को ओड लिया,
और हर सच को बार-बार झुटलाने की कोशिश की,
ख़्वाबों को सिरहाने रखकर सो जाने की कोशिश की!!

रोज़ हंसी, तो रोज़ ख़ुशी जब रोज़ सवेरे उगते थे,
गम के तिनके चोंच में लेकर, थोडा थोडा चुगते थे,
क़ैद थे तब हम ख्वाहिशों के एक अन्जान से पिंजरे में,
जिसको तोड़ ताड़ के हमने उड़ जाने की कोशिश की,
ख़्वाबों को सिरहाने रखकर सो जाने की कोशिश की!!

Wednesday, March 3, 2010

कलम


एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है,
मजबूर नहीं हैरान है शख्स,
जज़्बातों को कौन रोक रहा है!!

आसानी से जीना था,
पर जीने के अंदाज़ ही बदले,
ख़ामोशी को चीर के तन्हा,
आवाजों के साज़ भी बदले,
बेचैनी के दरिया में तैरता ,
पागल मन कचोट रहा है!!
एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है!!

सोच की नोक तो पैनी थी,
अब लिखने में भी धार हुई,
कागज़ के टुकडो पर चलते,
कब कलम तेज़ तलवार हुई,
विचार यही मेरे शब्दों के
किनारों को खरोंच रहा है!!
एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है!!