Thursday, December 27, 2012

मेरी परी ...




ना कोई उम्मीद थी दिल में,
ना कोई अरमान थे मन में,
फिर भी कुछ अधूरापन था,
मेरे बचपन में !
यूँ तो हम दो फूल थे
जिससे महक रहा था उपवन,
सूनी थी कलाई,
 घर में नहीं थी कोई बहन!
 एक बुझी उम्मीद थी दिल में
अधूरा एक अरमान था मन में
इतनी छोटी आस लिए हम
जीते रहे बचपन में !
मौसम बदला, बदली जिंदगी और
बदली वक़्त ने करवट,
मेरे आशियाने में हुई
एक मासूम सी आहट!
मेरे सूने आँगन में आ
गयी रोनक-ऐ-बहार
चाँद के एक टुकड़े को मेरे
हाथों में दिया उतार!
 नीले आकाश का विस्तार
लिए छोटा सा आकार,
एक चहक फूलों की महक
मेरे बरसों का इंतज़ार!
पंखों से ऊँची उड़ान,
मेरी झोली में सारा आसमान,
बनके इन्द्रधनुष की ड़ोर,
महकी मेरे चारों ओर!
आँखों में सुर्ख बेचैनियाँ,
लो देखों बोलने लगी खामोशियाँ,
नाज़ुक होंठ सुरीली आँखें,
बंद झरोकों से झांके।
ज़िन्दगी के सारे रंग लिए,
तुतलाने के नए ढंग लिए।
मेरी खुशियों को तो जैसे एक नियामत मिली,
मेरे घर के आँगन में एक नन्हीं कली फिर खिली!
" गूंजी किलकारी, इन नैनों से बहे क्यों झरना,
  मेरी गुड़िया, मेरी परी, मेरे बरसों का सपना!!"
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Azaad Shekhar