Friday, March 8, 2013

अक्शैनी 
बनके मेरी आँखों का नूर,
लेके आई खुशियाँ भरपूर,
मांगते हाथों पे मेरे रख दी कलियाँ,
दुआ कर ली खुदा ने मंज़ूर!

जाने कहाँ सीखा मुस्कुराना,
अधखुली आँखों से खिलखिलाना,
ख्वाहिशें तो थी आसमान से परे,
चाँद का फिर भी मिल गया खज़ाना!
अब नहीं है तम्मना और कोई,
हाँ लड्डू मिल गया मुझे मोतीचूर!
मांगते हाथों पे मेरे रख दी कलियाँ,
दुआ कर ली खुदा ने मंज़ूर!

गोद में जब मेरी वो झूले,
मेरी खुशियाँ बुलंदियों को छूले,
ज़िन्दगी में उमंग है आई,
मन मेरा प्रसन्नित हो के फूले!
बस इतनी सी बात है सच मान लो
मेरी पारी है मेरा गुरूर,
मांगते हाथों पे मेरे रख दी कलियाँ,
दुआ कर ली खुदा ने मंज़ूर!

Thursday, December 27, 2012

मेरी परी ...




ना कोई उम्मीद थी दिल में,
ना कोई अरमान थे मन में,
फिर भी कुछ अधूरापन था,
मेरे बचपन में !
यूँ तो हम दो फूल थे
जिससे महक रहा था उपवन,
सूनी थी कलाई,
 घर में नहीं थी कोई बहन!
 एक बुझी उम्मीद थी दिल में
अधूरा एक अरमान था मन में
इतनी छोटी आस लिए हम
जीते रहे बचपन में !
मौसम बदला, बदली जिंदगी और
बदली वक़्त ने करवट,
मेरे आशियाने में हुई
एक मासूम सी आहट!
मेरे सूने आँगन में आ
गयी रोनक-ऐ-बहार
चाँद के एक टुकड़े को मेरे
हाथों में दिया उतार!
 नीले आकाश का विस्तार
लिए छोटा सा आकार,
एक चहक फूलों की महक
मेरे बरसों का इंतज़ार!
पंखों से ऊँची उड़ान,
मेरी झोली में सारा आसमान,
बनके इन्द्रधनुष की ड़ोर,
महकी मेरे चारों ओर!
आँखों में सुर्ख बेचैनियाँ,
लो देखों बोलने लगी खामोशियाँ,
नाज़ुक होंठ सुरीली आँखें,
बंद झरोकों से झांके।
ज़िन्दगी के सारे रंग लिए,
तुतलाने के नए ढंग लिए।
मेरी खुशियों को तो जैसे एक नियामत मिली,
मेरे घर के आँगन में एक नन्हीं कली फिर खिली!
" गूंजी किलकारी, इन नैनों से बहे क्यों झरना,
  मेरी गुड़िया, मेरी परी, मेरे बरसों का सपना!!"
--
Azaad Shekhar

Monday, April 25, 2011


तिनको ने आज नीड़ का एलान कर दिया,
हर ज़ुल्म की इबारत तोड़ देंगे हम,
हाथ उठेगा तो उसको मोड़ देंगे हम,
लो धडकनों को भी हमने तूफ़ान कर दिया,
तिनकों ने आज नीड़ का एलान कर दिया।





गुँथ
गया है रस्सियों में रस्सियों का बल,
सोचना ही बस नहीं है, मुश्किलों का हल,
खुद से ही नए हौसलों को बयान कर लिया,
तिनकों ने आज नीड़ का एलान कर दिया।

किनारों को अक्सर लहरें तोड़ देती है,
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी ही निचोड़ देती है,
मजबूरियों का हमने क़त्ल-ऐ-आम कर दिया,
तिनकों ने आज नीड़ का एलान कर दिया।

Tuesday, March 8, 2011

ज़िन्दगी के ये चार आने,
चल रहे हैं किसी बहाने,
ढेर सारी उल्झंनो में
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने,
ज़िन्दगी के ये चार आने,
जी के देखो किसी बहाने,

बेपरवाह सी है आरज़ू,
बेपरवाह लम्हों की कतार भी,
जानकार जीने की लत पाली,
इतना लम्बा इंतज़ार भी,
कोशिशों को ठोकर लगी जब
लोग आये आज़माने।
ज़िन्दगी के ये चार आने,
दे गए गुज़रे ज़माने।
ढेर सारी उलझनों के बीच,
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने


आज फिर से होने लगा है,
बासी दिन से मुझको प्यार,
धुप लेटी थी छत के ऊपर,
सहमी खड़ी थी घर की दीवार।
जाने हवा ने कब करवट बदली,
बिछने लगे सारे शामियाने।
ज़िन्दगी के ये चार आने,
आयें हैं हमको फुसलाने,
ढेर सारी उलझनों के बीच,
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने।

Friday, October 22, 2010

जाना माना


एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है,
तस्वीरों में ही मिलती है, वो चाँद के जैसे खिलती है,
बातों में उसकी उलझन है, न कह दे उसका ही मन है,
हर वक़्त उसी का बहाना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!



गुस्से
में तीखी तीखी है, पर शहद से ज्यादा मीठी है,
अपने कन्धों पर भार लिए, उठती है सुबह तैयार किए,
कामयाबी को सर पे उठाना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!




उम्मीद
किरण का थामे हाथ, चलती है हवा के साथ साथ,
ख्वाहिश को रोज़ बदलती है, और शाम के जैसे ढलती है,
ठोकर में उसके ज़माना है,
एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है!!

एक चेहरे को पहचाना है, जो थोड़ा जाना माना है,
तस्वीरों में ही मिलती है, वो चाँद के जैसे खिलती है,
बातों में उसकी उलझन है, न कह दे उसका ही मन है,
हर वक़्त उसी का बहाना है!!

Monday, October 11, 2010

अजीब मोड़

कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

चलते हुए कदम में कहीं मोच आ गयी,
रुक कर के सब्र कर लो, यही सोच आ गयी,
गहरे अँधेरे रास्तों पर थम सा गया था वक़्त,
आसान नहीं था चलना, राहें थी सर्द सख्त,
कोशिश की पोटली को काँधें पे ढो लिया,

और भर लिया ख्वाबों को आँखों में रात भर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

ये रास्ता था अपना जाना सा पहचाना,
इस रात की छलनी से अच्छे से हमने छाना,
कुछ देर यूँ ही बैठे हम खाली खाली,
कुछ देर नींद लेके, आँखें की हमने काली,
खामोश सी हवा भी उड़ती सी जा रही थी,
हम थे किनारे बैठे अपनी ही राह पर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!

Thursday, June 17, 2010

हवा


न है जज़्बात, न ही होश, बड़ी ही अजीब हवा,
दिखाई देती है एक सी ये बदतमीज़ हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
में होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा,
किसी मिजाज़ से ताल्लुक था मेरा सदियों से,
मेरे संग-संग उसके भी घर गयी ये हवा!!


इधर
-उधर की झंझटों से बेख़ौफ़ था,
मेरे होशोहवास का भी अजीब शौक था,
मुझे बहा के ले गयी किसी किनारे पे, मगर
मेरे अंदाज़-ऐ-रूबरू से डर गयी ये हवा!!

ये राह खूब थी, उड़ती थी मिटटी पैरों में,
सफ़र की भीड़ में गिनते थे खुद को गैरों में,
थाम के हाथ, बड़ी दूर तलक साथ चली,
जो आया मोड़ तो खुद-ब-खुद उतर गयी ये हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
मैं होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा!!