Monday, November 23, 2009

चाँद की मांद


निकलो तुम चाँद की मांद से,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,

निकलो तुम चाँद की मांद से,



सरपट चलती राहें आवारा,

सूख गई अब नदी की धारा,

हम उम्मीद लगाये हैं नांव से ,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,

निकलो तुम चाँद की मांद से,

बैचैनी सी एक उबल रही है,

खावाहिशों को कैसे निगल रही है,

हैरानगी सी है, हवाओं से,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,


निकलो तुम चाँद की मांद से,

मेरे फटे जूत्ते

इस मोड़ से रोज़ निकलते हैं,
हर कड़वा घूँट निगलते हैं,
मेरे साथ ये फिर भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………

हर मुश्किल को, आसान किया है,
बुरे वक्त में, बड़ा अहसान किया है,
मेरी मजबूरी से पलते हैं,
मेरे साथ ये फिर भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………



बेरोज़गारी की करवट को सहा है,
उमीदों का दिया जलता ही रहा है,
फिर लोगो की दिल क्यों जलते हैं,
मेरे साथ ये जब भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………

भाग-2

दिन आज न जाने थम सा गया है,
कहीं लम्हा मनो जम सा गया है,
अंधेरे का राज़ उगलते हैं,
एक कोने में पड़े मचलते हैं,
मेरे साथ आज, ये नही चलते हैं...
मेरे फटे जूत्ते…………

रुक गई हैं

लकड़ी की मेंज पर,
कुछ अधूरे पन्ने
और कुछ बिखरी पुस्तकें,
वहीं कोने में पड़ी एक घड़ी,
कुछ आवाजें, और
कुछ दस्तकें,
रुक गई हैं,
मेरे दिन की तरह!!





यह
रोज़ सवेरे उगता है,
मीठी अंगड़ाई लेता है
इस दिन के सीने में फिर
क्यूँ अरमान दिखायी देता है,
उन अरमानो की लड़ी कहीं
उन लम्हों की हरकतें,
रुक गई हैं
मेरे दिन की तरह!!

आज से कुछ महीनो पहले,
एक कमरे में कुछ तेय हुआ था,
जब दिन की बैटरी डाउन हुई,
तब 10.४० का समय हुआ था,
उस रात ki भीगी पलकें,
और साये में लिपटी सिलवटें,
रुक गई हैं
मेरे दिन की तरह!!

दो हिस्से!!


सड़क के दो हिस्से और दोनों ही खाली,
दो हिस्सों के बीच streetlight की रोशनी साली,
रुक कर मेरे पास तन्हाई ने मांगी,
समय की मीठी बर्फी १० रुपए वाली!!

मैंने सोचा......

३ रुपए के समय का ऑफिस में खर्चा हुआ,
Ideas की बोली लगी, और layouts पे चर्चा हुआ,
दिमाग को पूरा चाट गए client servicing वाले
फिर Boss का power ब्रेक हुआ चलो अछा हुआ!!



और……..

४ रुपए का समय दोस्त के घर जाकर पिया,
उसने गिले शिकवो का neat peg दिया,
होश, पर् लगा कर हवा में उड़ने लगे
जब बूंदों को हमने ग्लास में लिया,

यह……..

२ रुपए का समय तो मै कहीं दे आया था,
कुछ मीठे अल्फाज़ और कुछ हंसी लाया था,
कागज़ पर उन अल्फाजो को क़ैद कर लिया,
और हंसी को बाँध कर मांजे से उडाया था!!

लेकिन……….

अब बचा है केवल १ रुपए का समय,
तन्हाई को दूं, या अपने घर वालों को,
समय! मैं अब तक दोनों को ही नहीं दे पाया,
फिजूल में इधर उधर अपना समय गंवाया!!

फिर सोचा….

१ रुपए की समय की बर्फी घर ले जाऊँ,
थोड़ी थोड़ी सबके हिस्से से मैं खाऊं?
तन्हाई को भी एक निवाला दे दू
रोज़ अगर मैं समय से अपने घर जाऊँ?





ये दुनिया


इस दुनिया में जीना क्या है?
जीना एक उलझन है,
पल पल है तड़प, होंठों पे आह,
आँखों में बस चुभन है!





खामोशी भी साथ ना देगी
इस उजड़ी बस्ती में,
हर कोने में धुआं धुआं
हर कोने में घुटन है,
इस दुनिया में जीना क्या है?
जीना एक उलझन है,

वक़्त है कैसा खोया खोया
रोज़ सवेरा, रोज़ अँधेरा,
रोज़ पुरानी वही ज़िन्दगी
रोज़ वही एक दिन है,
इस दुनिया में जीना क्या है?
जीना एक उलझन है!!

इन हाथों में इतनी लकीरें
कोई सही नहीं है,
खाली खाली किस्मत है
बस खाली कोरापन है,
इस दुनिया में जीना क्या है?
जीना एक उलझन है!!