Tuesday, March 8, 2011

ज़िन्दगी के ये चार आने,
चल रहे हैं किसी बहाने,
ढेर सारी उल्झंनो में
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने,
ज़िन्दगी के ये चार आने,
जी के देखो किसी बहाने,

बेपरवाह सी है आरज़ू,
बेपरवाह लम्हों की कतार भी,
जानकार जीने की लत पाली,
इतना लम्बा इंतज़ार भी,
कोशिशों को ठोकर लगी जब
लोग आये आज़माने।
ज़िन्दगी के ये चार आने,
दे गए गुज़रे ज़माने।
ढेर सारी उलझनों के बीच,
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने


आज फिर से होने लगा है,
बासी दिन से मुझको प्यार,
धुप लेटी थी छत के ऊपर,
सहमी खड़ी थी घर की दीवार।
जाने हवा ने कब करवट बदली,
बिछने लगे सारे शामियाने।
ज़िन्दगी के ये चार आने,
आयें हैं हमको फुसलाने,
ढेर सारी उलझनों के बीच,
सुलझे सुलझे हैं फिक्राने।