
न है जज़्बात, न ही होश, बड़ी ही अजीब हवा,
दिखाई देती है एक सी ये बदतमीज़ हवा!!
उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
में होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा,
किसी मिजाज़ से ताल्लुक था मेरा सदियों से,
मेरे संग-संग उसके भी घर गयी ये हवा!!
इधर-उधर की झंझटों से बेख़ौफ़ था,
मेरे होशोहवास का भी अजीब शौक था,
मुझे बहा के ले गयी किसी किनारे पे, मगर
मेरे अंदाज़-ऐ-रूबरू से डर गयी ये हवा!!
ये राह खूब थी, उड़ती थी मिटटी पैरों में,
सफ़र की भीड़ में गिनते थे खुद को गैरों में,
थाम के हाथ, बड़ी दूर तलक साथ चली,
जो आया मोड़ तो खुद-ब-खुद उतर गयी ये हवा!!
उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
मैं होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा!!
