Thursday, June 17, 2010

हवा


न है जज़्बात, न ही होश, बड़ी ही अजीब हवा,
दिखाई देती है एक सी ये बदतमीज़ हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
में होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा,
किसी मिजाज़ से ताल्लुक था मेरा सदियों से,
मेरे संग-संग उसके भी घर गयी ये हवा!!


इधर
-उधर की झंझटों से बेख़ौफ़ था,
मेरे होशोहवास का भी अजीब शौक था,
मुझे बहा के ले गयी किसी किनारे पे, मगर
मेरे अंदाज़-ऐ-रूबरू से डर गयी ये हवा!!

ये राह खूब थी, उड़ती थी मिटटी पैरों में,
सफ़र की भीड़ में गिनते थे खुद को गैरों में,
थाम के हाथ, बड़ी दूर तलक साथ चली,
जो आया मोड़ तो खुद-ब-खुद उतर गयी ये हवा!!

उड़ा के शाख से पत्ते बिखर गयी ये हवा,
मैं होश में नहीं था, और गुज़र गयी ये हवा!!


Monday, June 7, 2010

सिगरेट


लबों पर मोम सी पिघलती हुई,
धुंए के राज़ उगलती हुई,
ख़ामोशी से गल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!

एक से दो, तो दो से चार, बारी बारी सब तैयार,
थाम के सबकी ऊँगली जलती, थोडा थोडा सब से प्यार,
आपस की रंजिश को धीरे धीरे निगल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!




फिर
एक जली, माचिस की तीली,
चिंगारी से उम्मीद खिली,
ये अंगड़ाई उठाती हाथों की सुराही,
ले जाती है जाने किस गली?
जहाँ आवाजें बदल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥

न जागी है न सोई हुई,
बुझती है तो जैसे रोई हुई,
एक दूजे से नाराज है ये,
चुपचाप है कैसे खोई हुई,
हर पैकेट में डल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥