Wednesday, December 2, 2009

जाग रहा हूँ



वक्त से आगे निकलने के लिए

कितना भाग रहा हूँ?

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



मेहनत की एक हांड़ी में,

किताबी पुलाओ पकाए थे,

पूरे साल बचा बचा कर,

थोड़े थोड़े खाए थे!!

किस्मत ने एक शर्ट सिली थी

लम्हों से जो पेंट मिली थी,

उन्हें अब त्याग रहा हूँ,

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



चार आने की कोशिश को,

जेब में रखकर निकले थे,

मक्कारी के भारी केले,

पैरों तले कुचले थे,

सौ तोले के ख्वाब सजाकर लॉकर में

उनकी कुंजी खो दी, ठोकर में,

मैं जब भी बैराग रहा हूँ

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!



अब तन्हाई के छल्ले हवा,

में लटक रहे हैं,

धीरे धीरे, लम्हों की

सिगरेट गटक रहे हैं,

पैसों में भीगा समय आज बदल गया

और धुंए में उलझा खर्चा भी तो चल गया,

मैं उँगलियों पे सूखा दाग रहा हूँ,

फिर भी,

बेफिक्र हो ज़िन्दगी, तेरे लिए

मैं जाग रहा हूँ!!!

2 comments:

Sonia Pratap Singh said...

bahot khoob..teri har ek poem mai mujhe ek feeling dikhti hai.tera word selection bahot achcha luga..kya bolu mujhe yeh poem bahot bahot achchi lugi.

Unknown said...

awesum man kaha se ladaya itna dimag. its really mind blowing