लबों पर मोम सी पिघलती हुई,
धुंए के राज़ उगलती हुई,
ख़ामोशी से गल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!
एक से दो, तो दो से चार, बारी बारी सब तैयार,
थाम के सबकी ऊँगली जलती, थोडा थोडा सब से प्यार,
आपस की रंजिश को धीरे धीरे निगल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है!!
फिर एक जली, माचिस की तीली,
चिंगारी से उम्मीद खिली,
ये अंगड़ाई उठाती हाथों की सुराही,
ले जाती है जाने किस गली?
जहाँ आवाजें बदल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥
न जागी है न सोई हुई,
बुझती है तो जैसे रोई हुई,
एक दूजे से नाराज है ये,
चुपचाप है कैसे खोई हुई,
हर पैकेट में डल जाती है,
ये सिगरेट जब जल जाती है॥
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