Monday, November 23, 2009

रुक गई हैं

लकड़ी की मेंज पर,
कुछ अधूरे पन्ने
और कुछ बिखरी पुस्तकें,
वहीं कोने में पड़ी एक घड़ी,
कुछ आवाजें, और
कुछ दस्तकें,
रुक गई हैं,
मेरे दिन की तरह!!





यह
रोज़ सवेरे उगता है,
मीठी अंगड़ाई लेता है
इस दिन के सीने में फिर
क्यूँ अरमान दिखायी देता है,
उन अरमानो की लड़ी कहीं
उन लम्हों की हरकतें,
रुक गई हैं
मेरे दिन की तरह!!

आज से कुछ महीनो पहले,
एक कमरे में कुछ तेय हुआ था,
जब दिन की बैटरी डाउन हुई,
तब 10.४० का समय हुआ था,
उस रात ki भीगी पलकें,
और साये में लिपटी सिलवटें,
रुक गई हैं
मेरे दिन की तरह!!

1 comment:

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं.
आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.
SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com