Friday, December 18, 2009

बंद खिड़की


नुक्कड़ के लेम्प पोस्ट पे फिसलना चाहती हूँ,

गली के बच्चो के साथ खेलना चाहती हूँ,

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


होर्न बजाती गाड़ियों की आवाज़ सदा गिनती रही

ठेले वालों के राज़ गौर से सुनती रही,

अब खुद से हवा के तार छेड़ना चाहती हूँ

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


बच्चों की गेंदों की थाप सही,

न कुछ बोली मैं चुप चाप रही,

अब खुल के उन्हें डांटना चाहती हूँ

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो खुलना चाहती हूँ


अपनी जिद्द को किया पूरा मैंने,

बाहर की हर बईमानी को घूरा मैंने,

जब देखा मासूमियत पे अत्याचार,

तो आँखें रोई हज़ार बार,

निर्दोषों का परिवार कहीं कोई लूट गया,

फिर किसी से अपना कोई छूट गया,


इन्हें देखकर आँखें बंद करना चाहती हूँ,

मैं कमरे की बंद खिड़की हूँ,

जो अब नहीं खुलना चाहती हूँ!!!

2 comments:

zehra said...

bahut badiya likha hai shekhar.... hoping to see a great poetic future..best of luck, keep it up

Azaad said...

shukriya zehra, aapne comment kiya mujhe bahut acha laga, ab aapki profile to lock hai main dekh nahi sakta lekin main dekhna chahunga aapki profile, aapko agar bura na lage to?