Wednesday, March 3, 2010

कलम


एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है,
मजबूर नहीं हैरान है शख्स,
जज़्बातों को कौन रोक रहा है!!

आसानी से जीना था,
पर जीने के अंदाज़ ही बदले,
ख़ामोशी को चीर के तन्हा,
आवाजों के साज़ भी बदले,
बेचैनी के दरिया में तैरता ,
पागल मन कचोट रहा है!!
एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है!!

सोच की नोक तो पैनी थी,
अब लिखने में भी धार हुई,
कागज़ के टुकडो पर चलते,
कब कलम तेज़ तलवार हुई,
विचार यही मेरे शब्दों के
किनारों को खरोंच रहा है!!
एक जगह कोई टोक रहा है,
नए रस्ते पे झोंक रहा है!!

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