कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
चलते हुए कदम में कहीं मोच आ गयी,
रुक कर के सब्र कर लो, यही सोच आ गयी,
गहरे अँधेरे रास्तों पर थम सा गया था वक़्त,
आसान नहीं था चलना, राहें थी सर्द सख्त,
कोशिश की पोटली को काँधें पे ढो लिया,
और भर लिया ख्वाबों को आँखों में रात भर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
ये रास्ता था अपना जाना सा पहचाना,
इस रात की छलनी से अच्छे से हमने छाना,
कुछ देर यूँ ही बैठे हम खाली खाली,
कुछ देर नींद लेके, आँखें की हमने काली,
खामोश सी हवा भी उड़ती सी जा रही थी,
हम थे किनारे बैठे अपनी ही राह पर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
इस रात की छलनी से अच्छे से हमने छाना,
कुछ देर यूँ ही बैठे हम खाली खाली,
कुछ देर नींद लेके, आँखें की हमने काली,
खामोश सी हवा भी उड़ती सी जा रही थी,
हम थे किनारे बैठे अपनी ही राह पर,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
कल थे अजीब मोड़, अजीबो गरीब था सफ़र,
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
आधे से लौट आये थे मुसाफिर अपने घर!!
1 comment:
Real Good!
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