Monday, November 23, 2009

मेरे फटे जूत्ते

इस मोड़ से रोज़ निकलते हैं,
हर कड़वा घूँट निगलते हैं,
मेरे साथ ये फिर भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………

हर मुश्किल को, आसान किया है,
बुरे वक्त में, बड़ा अहसान किया है,
मेरी मजबूरी से पलते हैं,
मेरे साथ ये फिर भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………



बेरोज़गारी की करवट को सहा है,
उमीदों का दिया जलता ही रहा है,
फिर लोगो की दिल क्यों जलते हैं,
मेरे साथ ये जब भी चलते हैं,
मेरे फटे जूत्ते…………

भाग-2

दिन आज न जाने थम सा गया है,
कहीं लम्हा मनो जम सा गया है,
अंधेरे का राज़ उगलते हैं,
एक कोने में पड़े मचलते हैं,
मेरे साथ आज, ये नही चलते हैं...
मेरे फटे जूत्ते…………

3 comments:

संजय भास्‍कर said...

लाजवाब पंक्तियाँ
बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
Email- sanjay.kumar940@gmail.com

संजय भास्‍कर said...

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं.
आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.
SANJAY KUMAR
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Sonia Pratap Singh said...

intresting shekhar..ek din teri yeh mehnat zaroor rang layegi.