Monday, November 23, 2009

चाँद की मांद


निकलो तुम चाँद की मांद से,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,

निकलो तुम चाँद की मांद से,



सरपट चलती राहें आवारा,

सूख गई अब नदी की धारा,

हम उम्मीद लगाये हैं नांव से ,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,

निकलो तुम चाँद की मांद से,

बैचैनी सी एक उबल रही है,

खावाहिशों को कैसे निगल रही है,

हैरानगी सी है, हवाओं से,

देखो सूरज की तपिश यहाँ,

गुज़रती है हर एक छाँव से,


निकलो तुम चाँद की मांद से,

4 comments:

C.K.UJJAWAL said...

अच्छा लिखते है आपकी भावनाओ का स्वागत है।

उद्गार said...

Waah...ati sundar kya baat kahi aapne...acchhi prastuti. badhai sweekarein!!!

shalini said...

ur expressions realy realy worth admiration & pics added to all ur poems made them very classic.i read most of them.congrts

Azaad said...

thanks shalini ji... aapko acha laga yahi bahut hai!!